Saturday, March 2, 2019

शिवा बावनी

महाकवि भूषण रचित छंद

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है ।
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।
ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल,
गजन की ठेल पेल सैल उसलत है ।
तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ।

No comments:

Post a Comment

काव्य गोष्ठी का हुआ आयोजन

छतरपुर, दिनांक 11 जुलाई 2026 विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत, मध्यप्रदेश की छतरपुर इकाई द्वारा स्वामी विवेकानंद सभागार, गायत्री शक्तिप...